
पंडित दिव्यांश शर्मा स्वतन्त्र पत्रकार हरिद्वार, 11 जुलाई। हिंदुस्तान के प्रत्येक राज्य में राज्य मानवाधिकार आयोग की स्थापना और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना 1993 में आवश्यक संशोधन किए जाने के संबंध में हरिद्वार के अरुण भदोरिया अधिवक्ता, कमल भदोरिया अधिवक्ता, सुमेधा भदोरिया अधिवक्ता पत्नी अनिरुद्ध प्रताप सिंह, चेतन भदोरिया विधि स्नातक अध्ययनरत ने महामहिम राष्ट्रपति महोदय भारत सरकार नई दिल्ली, राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को एक ज्ञापन पत्र भेजकर हिंदुस्तान के प्रत्येक राज्य के, प्रत्येक जनपद में जिला मानवाधिकार आयोग की स्थापना की मांग की है।ज्ञापन पत्र में भदोरिया एसोसिएट द्वारा बताया गया कि संविधान का अनुच्छेद 14, 19, 21, 22, 23, 25, 32 तथा अन्य संवैधानिक प्रावधान जो प्रत्येक व्यक्ति को मौलिक अधिकारों की रक्षा करते हैं और इन्हें संवैधानिक आदर्श को प्रभावी बनाने के उद्देश्य के लिए मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 के अंतर्गत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्यों में राज्य मानवाधिकार आयोग की स्थापना की गई थी।उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय एवं राज्य मानवाधिकार आयोग ने अनेक मामलों में महत्वपूर्ण कार्य किया है, किंतु देश की विशाल जनसंख्या, भौगोलिक विस्तार और प्रत्येक जिले में प्रतिदिन सामने आने वाले मानवाधिकार उल्लंघन की संख्या को देखते हुए वर्तमान व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। आज भी लाखों नागरिक ऐसे हैं जिन्हें पुलिस अत्याचार, अवैध हिरासत, महिलाओं एवं बच्चों के विरुद्ध, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के विरुद्ध उत्पीड़न, दिव्यांग जनों तथा कमजोर वर्गों को अधिकारों के हन जैसी परिस्थितियों में समय पर राहत नहीं मिल पाती।राज्य में राज्य मानवाधिकार आयोग केवल राज्य मुख्यालय तक सीमित है जहां तक पहुंचना प्रत्येक नागरिक के लिए संभव नहीं है। हिंदुस्तान के प्रत्येक जिले में जिला न्यायालय, जिला अधिकारी, पुलिस अधीक्षक, मुख्य चिकित्सा अधिकारी, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, उपभोक्ता आयोग, तथा अन्य अनेक संस्थाएं कार्यरत हैं। जब शासन और न्याय की अन्य व्यवस्थाएं जिला स्तर तक उपलब्ध हैं तब मानवाधिकार संरक्षण जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण व्यवस्था भी जिला स्तर तक उपलब्ध कराना समय की आवश्यकता है। भदोरिया एसोसिएट द्वारा जिला मानवाधिकार आयोग की स्थापना के प्रमुख उद्देश्य बताए गए। प्रत्येक नागरिक को स्थानीय स्तर पर मानवाधिकार संरक्षण उपलब्ध होगा। मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों का शीघ्र संज्ञान लेकर समयबद्ध जांच सुनिश्चित होगी। पीड़ित को राज्य मुख्यालय जाने की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी। महिलाओं, बच्चों, वृद्धजनों, दिव्यांग जनों एवं कमजोर वर्गों को तुरंत सहायता उपलब्ध कराई जा सकेगी। पुलिस थाना, जेल, बाल गृह, वृद्धाश्रमों, मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों तथा अन्य सरकारी संस्थाओं का नियमित निरीक्षण होगा। मानवाधिकारों के प्रति जन जागरूकता बढ़ेगी। राज्य मानवाधिकार आयोग पर बढ़ते मामलों का बोझ कम होगा। संविधान में निहित मानव गरिमा एवं मौलिक अधिकारों को जमीनी स्तर पर प्रभावी बनाया जा सकेगा। जिला मानवाधिकार आयोग के संभावित अधिकार और कार्य क्षेत्र के संबंध में बताया गया कि मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित शिकायत प्राप्त करना, आवश्यक होने पर जांच करना अथवा संबंधित विभाग से आख्या मांगना, पीड़ित को अंतरिम राहत एवं मुआवजे की संस्तुति करना, संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की संस्तुति करना, मानवाधिकार संरक्षण हेतु जिला प्रशासन को आवश्यक सुझाव देना, विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं सरकारी कार्यालयों में मानवाधिकार जागरूकता अभियान चलाना, प्रत्येक वर्ष जिला मानवाधिकार आख्या प्रकाशित करना इसका कार्य क्षेत्र होगा। इस व्यवस्था से न्याय आम नागरिक के द्वार तक पहुंचेगा, शिकायतों के निस्तारण में तेजी आएगी, प्रशासन की जवाबदेही बढ़ेगी, मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाओं में कमी आएगी, लोकतंत्र एवं सुशासन की भावना और मजबूत होगी, नागरिकों का शासन व्यवस्था पर विश्वास बढ़ेगा। अंत में निवेदन किया गया है कि मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 में आवश्यक संशोधन कर प्रत्येक जनपद में जिला मानवाधिकार आयोग की स्थापना का विधिक प्रावधान किया जाए। इस विषय पर विधि एवं न्याय मंत्रालय, गृह मंत्रालय तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के साथ विचार-विमर्श कर उच्च स्तरीय समिति गठित की जाए। समिति को निर्धारित समय सीमा में अपनी आख्या प्रस्तुत करने का निर्देश दिया जाए। संसद के आगामी सत्र में आवश्यक विधेयक प्रस्तुत कराकर जिला मानवाधिकार आयोग की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया जाए।








